अडानी पावर से बिजली ख़रीद पर कांग्रेस ने उठाये सवाल
देहरादून। कांग्रेस ने अडानी पावर को 25 वर्ष के लिए विजली खरीद पर सवाल उठाते हुए कहा कि धामी कैबिनेट का फैसला उत्तराखंड के हितों के लिए अत्यंत गंभीर है। आर्य ने कहा कि उत्तराखंड की नदियां, जल और प्राकृतिक संसाधन यहां की जनता की धरोहर हैं। जिस प्रदेश की पहचान जल विद्युत और प्राकृतिक ऊर्जा संसाधनों से है, उसी प्रदेश को 25 वर्षों के लिए निजी कंपनी से कोयला आधारित बिजली खरीदने के लिए बाध्य होना सरकार की ऊर्जा नीति पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
उन्होंने पूछा कि प्रदेश की जनता को यह बताना चाहिए कि आखिर ऐसी क्या मजबूरी है कि 25 साल के लिए अदाणी पावर से ₹5.746 प्रति यूनिट की दर पर 1,320 मेगावाट बिजली खरीदने का फैसला करना पड़ा? 25 वर्षों की अवधि वाला बिजली खरीद समझौता कोई सामान्य प्रशासनिक निर्णय नहीं है। यह प्रदेश की आने वाली कई पीढ़ियों पर आर्थिक प्रभाव डालने वाला फैसला है।
सरकार को सार्वजनिक रूप से यह बताना चाहिए कि इस करार के तहत 25 वर्षों में उत्तराखंड पर कुल कितनी वित्तीय देनदारी आएगी, टैरिफ में भविष्य में किस प्रकार के संशोधन होंगे, बिजली की वास्तविक आपूर्ति लागत क्या होगी और इस समझौते में प्रदेश के हितों की रक्षा के लिए कौन-कौन सी शर्तें रखी गई हैं।
बड़े बांधों और जलविद्युत परियोजनाओं के कारण हजारों परिवारों का विस्थापन हुआ, पर्यावरणीय प्रभाव झेला गया और उत्तराखंड की प्राकृतिक संपदा का उपयोग राष्ट्रीय ऊर्जा जरूरतों के लिए किया गया। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब नदियां हमारी हैं, जल हमारा है, पहाड़ हमारे हैं, तो उत्तराखंड की ऊर्जा नीति का लाभ उत्तराखंड की जनता को क्यों नहीं मिलना चाहिए? सरकार को पहले यह जवाब देना चाहिए कि प्रदेश की अपनी जलविद्युत क्षमता का पूरा उपयोग क्यों नहीं हो पा रहा है और राज्य को लगातार बाहर से बिजली खरीदने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है।
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के पास जलविद्युत के साथ-साथ सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और अन्य अक्षय ऊर्जा स्रोतों की भी संभावनाएं हैं। सरकार को यह बताना चाहिए कि इन विकल्पों को प्राथमिकता देने के बजाय इतने लंबे समय के लिए कोयला आधारित बिजली खरीदने का निर्णय क्यों लिया गया।
सरकार को बताना चाहिए कि 25 वर्षों में इस समझौते की अनुमानित कुल वित्तीय लागत कितनी होगी? ₹5.746 प्रति यूनिट की दर में कौन-कौन से शुल्क और समायोजन शामिल हैं? क्या भविष्य में इस दर में वृद्धि या अन्य वित्तीय भार की संभावना है? करार समाप्त करने अथवा पुनरीक्षण की क्या शर्तें हैं? उत्तराखंड की अपनी जलविद्युत क्षमता का वर्तमान उपयोग कितना है? राज्य को प्रतिवर्ष कितनी बिजली बाहर से खरीदनी पड़ती है? कोयला आधारित बिजली खरीद के पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन किस आधार पर किया गया है?
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के पास देश को ऊर्जा देने की क्षमता है। लेकिन विडंबना यह है कि प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध होने के बावजूद प्रदेश को अपनी जरूरत पूरी करने के लिए बाहर से बिजली खरीदनी पड़ रही है। धामी सरकार को अदाणी पावर के साथ 25 साल के इस करार पर प्रदेश की जनता को पूरा सच और पूरा हिसाब देना होगा।









