मुख्यमंत्री ने खुद संभाली कमान, दिल्ली, पंजाब व सिख प्रतिनिधियों से निरंतर संपर्क में रहे धामी
देहरादून। आपदा सहित कई मौकों पर धैर्य और निर्णय से हर परीक्षा मे खरे उतरते रहे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने एक बार फिर साबित किया कि उनमे नेतृत्व क्षमता कूट कूट कर भरी है। कर्णप्रयाग विवाद के दौरान जिस संयम, धैर्य और संवाद आधारित रणनीति के साथ उन्होंने पूरे घटनाक्रम को संभाला, उससे उनके नेतृत्व क्षमता मे खासी वृद्धि हुई।
कर्णप्रयाग मे स्थानीय और निहंग सिक्खों के बीच हैं विवाद के बाद दो दिनों तक प्रदेश हाई अलर्ट पर रहा, लेकिन मुख्यमंत्री ने पूरी स्थिति की कमान स्वयं संभाले रखी। वे लगातार पुलिस मुख्यालय, शासन, केंद्र सरकार, पंजाब सरकार तथा सिख समाज के प्रमुख प्रतिनिधियों के संपर्क में रहे। अकाल तख्त के साथ भी संवाद के सभी माध्यम खुले रखे गए, ताकि किसी प्रकार की गलतफहमी न पनपे और धार्मिक भावनाएं आहत न हों। सरकार का स्पष्ट संदेश था कि कानून अपना काम करेगा, लेकिन किसी भी समुदाय की आस्था और सम्मान के साथ कोई समझौता नहीं होगा।
धामी सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता यह भी थी कि कर्णप्रयाग की घटना का असर चारधाम और हेमकुंड साहिब यात्रा पर किसी भी रूप में न पड़े। दोनों यात्राएं उत्तराखंड की धार्मिक, सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान का महत्वपूर्ण आधार हैं। इसी कारण सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करने के साथ-साथ संवाद की प्रक्रिया भी लगातार जारी रखी गई।
बताया जाता है कि इसी रणनीति के तहत सिख समुदाय से जुड़े प्रदेश के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को निहंग प्रतिनिधियों से वार्ता की विशेष जिम्मेदारी सौंपी गई। जिससे तनाव को बढ़ने से रोकना, विश्वास बनाए रखना और पूरे मामले का शांतिपूर्ण समाधान निकाला जा सके।
राजनीति के जानकार मानते हैं कि इस पूरे घटनाक्रम ने मुख्यमंत्री धामी की नेतृत्व शैली का एक अलग पक्ष सामने आया है। सख्त प्रशासनिक फैसलों के लिए चर्चित धामी ने इस बार धैर्य, संवाद और संतुलन के जरिए हालात संभालते हुए यह संदेश देने का प्रयास किया कि संकट की घड़ी में दृढ़ता और संवेदनशीलता साथ-साथ चल सकती हैं।
सिलक्यारा टनल का ऑपरेशन हो या आपदा की कई परीक्षाएं अथवा तमाम आंदोलन, धामी ने हर बार धैर्य और सूझबुझ से हर संकट को टाल दिया। संवाद को प्रमुख हथियार बनाकर धामी वार्ता का प्लेटफॉर्म तैयार करते रहे है और उनके विरोधी भी उनकी इस महारत को मानते है। इस स्वाभाविक गुण ने उन्हे कई बार युवा चेहरे मे एक परिपक्व नेता के तौर पर उभारा और जिस तरह उन्होंने कर्णप्रयाग विवाद को सुलझाया यह निश्चित रूप से उनकी मजबूत हो रही नेतृत्व क्षमता का उदाहरण है।