राज्य गठन से अब तक वीरान हो चुके हैं 1100 गाँव
देहरादून। राज्य मे रिवर्स पलायन को लेकर तमाम दावे होते रहे हैं, लेकिन जमीनी सच्चाई अलग ही है। राज्य गठन से अब तक उत्तराखंड में करीब 11 सौ गांव वीरान हो चुके हैं। यही नहीं चार हेक्टेयर के करीब जमीन भी बंजर हो चुकी है। यह चिंताजनक आंकड़े कृषि मंत्री ने एक कार्यक्रम मे बताये। लेकिन हिंसक जंगली जानवरों के भय से अपने घर छोड़ रहे लोग कुछ अलग ही तस्वीर बयां कर रहे हैं
गुलदार, बाघ और भालू के हमलों से पर्वतीय क्षेत्रों मे लोग हलकान हैं। हर जिले मे हिंसक जानवर जान के लिए आफत बने हुए हैं। हालांकि बाघ और गुलदार के बाद भालू के हमलों ने उम्मीदें तोड़कर रख दी है।
पौड़ी जिले के पोखड़ा की पणिया ग्राम सभा के तोक गांव बस्ताग मेंम भालू के हमलों से आहत हरीश नौटियाल के परिवार ने गाँव छोड़ दिया। भालू ने एक सप्ताह के अंतराल में भालू ने उसके छह मवेशियों की जान ले ली। भालू ने घर आंगन को ही आशियाना बना दिया है। इस परिवार के चार सदस्यों ने पड़ोस के गांव में एक ग्रामीण के घर शरण ली है। इस परिवार के चले जाने से बस्तगा गांव वीरान हो गया है। गांव को आबाद करने वाला परिवार भी अब गाँव छोड़ गया।
हरीश प्रसाद नौटियाल गाँव मे दो दुधारू गाय, बैलों की जोड़ी और दो बकरियों के सहारे रह रहे थे। परिवार में पत्नी जसोदा देवी, बेटा संजय और तलाकशुदा बेटी शांति हैं। भालू ने एक सप्ताह के अंदर उनके सभी मवेशियों की जान ले ली। अब यह परिवार पणिया गांव में नागेंद्र सिंह के मकान में रह रहे हैं। अर्थिकी छिन जाने से परिवार पर ऐसा पहाड़ टूटा कि उम्मीद खत्म हो गयी।
पणिया के ग्राम प्रधान हर्षपाल सिंह नेगी के अनुसार बस्तगा तोक में डेढ़ दशक पूर्व तक 18 परिवार रहते थे, लेकिन सड़क आदि सुविधाएं न होने से लोग शहरों की ओर चले गए। कोरोना काल में जरूर कुछ लोग गांव पहुंचे और कच्चे मकानों को पक्का किया, लेकिन फिर लौटने की जरूरत नहीं समझी। पीड़ित परिवार वन महकमे से भालू के आतंक से निजात दिलाने की गुहर लगाता रहा, लेकिन सुनी नहीं गई। पणिया में भी गुलदार व भालू की दहशत है।
बाघ और गुलदार हमेशा से ही हिंसक रहे है, लेकिन इस बार भालू की आक्रामकता बढ़ी है। ऐसा कोई जिला नही है जहाँ भालू ने गौशाला तोड़कर मवेशियों को नही मारा अथवा लोगों पर जानलेवा हमले नही किये है। लोगों द्वारा विरोध प्रदर्शन भी किये गए। लेकिन हिंसक वन्य जीवों का खौफ कम नही हो रहा है। पलायन आयोग के गठन तक की कवायद भी परवान नही चढ़ी और पलायन तमाम सवाल राज्य के नीति नियंताओं के सामने छोड़ते जा रहे हैं।