(प्रेम पंचोली)
देहरादून से हल्द्वानी या देहरादून से काठगोदाम तक की यात्रा अमूमन मै “रेल” से ही करता हूँ। देहरादून से हल्द्वानी, रामनगर या काठगोदाम अथवा कुमाऊं क्षेत्र के लिए जो रात्रि बस सेवा है वह रात को जिन जिन होटल, ढाबों पर रुकती है, वे ढाबे वाले बहुत ही बदमाश किस्म के लोग होते है। यानी चाय, पानी या भोजन की यात्रियों से मुंहमांगी रकम वसूलते है। इसलिए मुझे यदि रात्रि को कुमाऊं क्षेत्र में आना है तो हल्द्वानी, काठगोदाम तक रेल से ही मुफीद मानता हूँ।
इस दौरान की यात्रा मात्र हल्द्वानी तक ही थी। इसलिए कि वहां मुझे प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक प्रकाश झा के सहयोगी निर्देशक गौरव जी और प्रोड्यूशर शुभम सिंह के साथ किसी कंटेन पर चर्चा करनी थी। सो मैं और मित्र मुकेश घलवान 4 सितंबर की रात्री को देहरादून काठगोदाम रेल से हल्द्वानी के लिए रवाना हुए।
दरअसल मुझे रायपुर रांझावाला से रेलवे स्टेशन पहुंचना था, तो मित्र मुकेश को सहस्त्रधारा रोड अमन विहार से रेलवे स्टेशन पहुंचना था। इसलिए मैने मुकेश को कहा कि वह मुझे क्रॉसिंग पर मिल जाए। क्योंकि मैं घर से स्कूटर लेकर जो आ रहा था। स्कूटर को रेलवे स्टेशन में छोड़ना था। वहां से रेल से सफर कर हल्द्वानी पहुंचना है। इस तरह मै क्रॉसिंग के पास नौ बजे रात्री को पहुंच गया। मुकेश को क्रॉसिंग तक पहुंचने में थोड़ा विलंब हो गया था। क्रॉसिंग में मुकेश के इंतजार करते मुझे याद आया कि जब तक मुकेश भाई यहां पहुंचता है, तब तक मैं एटीम से कुछ नगदी निकाल लेता हूँ। क्योंकि हर वक्त हर जगह यूपीआई काम नहीं करता। मगर मेरे बैग में एटीम नहीं मिला। अपनी पत्नी को फोन किया तो उन्होंने बताया कि एटीम तो घर पर ही है।
फिर मैने सोचा कि स्कूटर में तेल भी भरवा लेता हूँ और यूपीआई करके पेट्रोल पंप वाले से कुछ नगदी भी ले लेता हूँ। आम तौर पर पेट्रोल पंप वाले यूपीआई के मार्फत नगदी दे देते है। इस दौरान मेरे लिए यह पहला वाकया था कि पांच पेट्रोल पंपों पर गया, मगर किसी ने भी मुझे यूपीआई के माध्यम से नगदी नहीं दी। बकायदा यह भी कहा कि वह दिन लद गए जब पेट्रोल पंप वाले तुम जैसों को यूपीआई के माध्यम से नगदी दे देते थे। जबकि हाथ में नगदी की मोटी रकम थामे हुए सभी कर्मचारियों ने यह भी कहा कि उनके मालिक ने नगदी देने के लिए मना ही कर रखा है।
अभी भी मुकेश को मेरे पास पहुंचने में थोड़ा और देर लग गई। निराश होकर मैं फिर कुछ दुकानदारों के पास गया। कुछ ने तो स्पष्ट तौर पर कहा कि भाई साहब अब नगद कहां आ रहा है। सभी लोग यूपीआई करते है। तीन दुकानदारों ने कहा कि प्रति 100रूपए पर 10 रुपए अतिरिक्त चार्ज देना होगा। जितना चाहे उतना नगदी उनसे ले लो। मै थक हार कर क्रॉसिंग के पास स्कूटर पार्क कर ही रहा था कि इतने में मुकेश भाई पहुंच गया। तब तक रात्री के 10 बज चुके थे। हमारी ट्रेन रात्री के 11:30 बजे थी इसलिए हमारे पास समय काफी था।
इस तरह हम दोनों देहरादून रेलवे स्टेशन पहुंच गए। स्कूटर को एक निश्चित पार्किंग में खड़ा किया और मैने मुकेश भाई को कहा कि रिजर्वेशन काउंटर के बगल में दो चाय पानी की दुकान है, उन्हें भी पूछते हैं कि यूपीआई के बदले क्या वे कुछ नगदी दे सकते है? हम वहां पहुंचे, तो उन्होंने ने भी यही जबाव दिया कि किस जमाने की बात करते हो।
खैर मैने मुकेश भाई को कहा कि तुम्हारे पास कुछ नगद है। तो मुकेश ने कहा कि हो जाएंगे।
नियत समय पर देहरादून से काठगोदाम के लिए ट्रेन रवाना हुई। इस ट्रेन में सभी प्रकार की सुविधाएं चाकचौबंद थी। हम दोनों ने ओडन लिया और अपनी अपनी बर्थ पर सो गए।
इस ट्रेन में खास बात यह है कि कोई भी चाय पानी की फेरी करने वाले नहीं आते है। हालांकि हमारी सीट एसी कोच में थी। पर सिल्पर क्लास और जनरल डिब्बे में भी कोई चाय पानी की फेरी लगाने नहीं आते है। जब तक ऐसे कार्यों की फेरी लगाने वाले तैयार होते होंगे तब तक यह ट्रेन यानी सुबह सात बजे अपने गंतव्य स्थान पर पहुंच जाती है।
अगले दिन यानी 5 सितंबर शिक्षक दिवस के दिन हम लोग सुबह सात बजे हल्द्वानी पहुंच गए। रेलवे स्टेशन हल्द्वानी से जैसे हम लोग बाहर आते है पूर्व की भांति यहां ढोलक बस्ती आबाद होती दिखाई देती है। खुले आसमान के नीचे यहां हजारों लोग रहते है। इनमें से अधिकांश लोग ढोलक बनाने व बेचने का कार्य करते है। खैर इन पर फिर कभी लिखूंगा।
हल्द्वानी रेलवे स्टेशन से बाहर पहुंचकर मैने उन बॉलीवुड के साथियों क्रमशः गौरव और शुभम को फोन किया कि वह पहुंच गया है वे लोग कहां है। उन्होंने बताया कि वे लोग नैनीताल रोड पर स्थित “प्राइडबिजनेटल” होटल में रुके है, वहां पहुंच जाओ। मैने और मुकेश ने हल्द्वानी स्टेशन से ऑटो पकड़ा और होटल पहुंच गए। होटल पहुंचने तक के अंतराल में हमारी ऑटो वाले भाई से बातचीत हो गई। क्योंकि वह पहाड़ी लहजे में बात कर रहा था। उसने कहा कि वह भवाली का मूल निवासी है। आगे वह दबी आवाज में कहता है कि वह मुस्लिम समुदाय से है। मैने कहा कि भाईजान आप अपना परिचय देने में इतनी देर क्यों लगा रहे हो। उस ऑटो वाले भाई ने मेरी बात का जबाव सीधे शब्दों में कहा कि आजकल देश का राजनीतिक मिजाज बिगड़ रखा है। उसने यह भी कहा कि वह तो पहाड़ी मुसलमान है, फिर भी क्या करें? उक्त भाई की समस्या को स्पष्ट तौर पर समझा जा सकता है कि वह कुछ मौजूदा व्यवस्था से परेशान दिखाई दे रहा है। इतनी वार्तालाप करते करते हम होटल पहुंच गए। उन्हें उनका भाड़ा भुगतान करके उनसे विदा ली।
“प्राइडबिजनेटल” होटल में शुभम और गौरव जी हमारी ही इंतजारी कर रहे थे। पहुंचते ही फटाफट वॉशरूम आदि से विरक्त होकर हम होटल के बुफे पर नाश्ते के लिए चल दिए। नाश्ते के साथ हमने जरूरी बात का निष्कर्ष ले लिया। यह भी बात हुई कि फिल्म के उद्घाटन में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी शामिल हो रहे है। फिल्म की पूरी शूटिंग अल्मोड़ा, जागेश्वर आदि स्थानों पर होगी।
शुभम ने कहा कि प्रेम दा उन्हें आज ही बरेली से मुंबई की फ्लाइट पकड़नी है। इसलिए उन्होंने जरूरी बात करके हमसे विदा ली है।
हमे भी हल्द्वानी में कुछ लोगों से मिलना था। ठीक 12 बजे हमने होटल छोड़ा और जल योद्धा बच्ची सिंह बिष्ट को फोन घुमाया। उन्होंने कहा प्रेम तुम कुसुमखेड़ा चौक पर आ जाओ। बस, हम भी पीछे कहां रहने वाले ठहरे। ऑटो में बैठे और पहुंच गए कुसुमखेड़ा चौक। चौक पर पहुंचते ही ठीक मेरे पीछे बच्ची दा मौजूद हो गए। उन्होंने कहा कि सामने वाली बिल्डिंग के पास “फूल प्रेमी” राजेंद्र जोशी जी है, वहां बैठते है और गपशप मारते है। ऐसा कभी हो नहीं सकता कि बच्ची दा मिले और गपशप ही मारे। उनका मकसद राजेंद्र जोशी से मिलवाना था। श्री जोशी सच में ठहरे एक फूल प्रेमी। जिनके पास विदेशी प्रजाति के 400 प्रकार से अधिक के फूल पौध है। उनके पास प्रति पौधा 50 रुपए से लेकर 50 हजार रुपए तक के है। पर उन्हें कोई मलाल नहीं कि उनके फूल के पौधे बिक जाएं। दरअसल वे “निश्छल फूल प्रेमी” है। उन्होंने अपने ही घर की छत पर फूलों की पौधशाला बना रखी है। श्री जोशी ने हमे विदेशी फूलों की अलग अलग प्रजाति की जानकारी दी है। यह सच है कि मेरे लिए यह नया अनुभव था। यही बच्ची दा का मकसद भी था कि मैं राजेंद्र जोशी के कार्यों से रूबरू हो पाऊं।
श्री जोशी के पास इस वक्त ओबीसम ग्राफ्टेड, सोमालेंस, थाईलैंड की अरेबिकम जैसे सैकड़ों फूल पौधों की विभिन्न प्रजातियां हैं।
मैने बच्ची दा यानी बच्ची सिंह बिष्ट को पूछा कि संस्थागत कार्य कैसे चल रहा है, उन्होंने स्पष्ट जबाव दिया कि प्रेम उन्होंने साल 2014 में संस्था का कार्यक्रम बंद कर दिया है। क्योंकि आर्थिक संसाधनों को जुटाने में समस्या आने लग गई थी, तथा संस्था के कानूनी कागजातों की रिक्वायरमेंट को बेवजह इतनी पेचीदा बना दी गई है जिसे एक जमीनी स्तर का कार्यकर्ता कभी पूरा नहीं कर सकता। खैर, लंबी चर्चा हुई। इतना तय है कि आज भी बच्ची दा गांव गांव जाकर जल संरक्षण का कार्य समुदाय के साथ मिलकर व समुदाय के सहयोग से संपन्न करते है। मुझे अब उत्तरांचल मुक्त विश्वविद्यालय में हैलो हल्द्वानी रेडियो की उद्घोषिका व पत्रकार सुनीता भट्ट, विश्वविद्यालय में ही कार्यरत डा० आरुषि ध्यानी से भी मिलने जाना था। पत्ता चला कि आज विश्वविद्यालय में अवकाश है। यह सूचना मिली कि विश्वविद्यालय में पत्रकारिता एवं संचार विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो० राकेश रयाल भी वहां नहीं है। वे देहरादून इसलिए गए कि वहां “हैलो हल्द्वानी” रेडियो के एप का उद्घाटन मुख्यमंत्री करने जा रहे है। अब विश्वविद्यालय जाने का कार्यक्रम एकदम निरस्त हो गया।
इसके बाद मैने बच्ची दा को कहा कि मुझे आप पत्रकार जगमोहन रौतेला के घर ले चलो। क्योंकि मुझे श्री रौतेला भाई से मिलना जरूरी था, की वह कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे। बच्ची दा ने जगमोहन भाई को फोन कर दिया कि प्रेम और उनके साथी मुकेश आपको मिलने आ रहे है। जगमोहन भाईजी ने कहा कि प्रेम को तो आना ही चाहिए, क्यों न आए, वह यदि हल्द्वानी में है तो उसे घर आना ही चाहिए। इतनी वार्तालाप के बाद बच्ची दा और राजेंद्र जोशी जी ने हमे वरिष्ठ पत्रकार जगमोहन रौतेला के घर अपनी मोटरसाइकल से छोड़ दिया। पहुंचते ही जगमोहन भाईजी ने मुझे गले लगाया, मेरी पीठ थपथपाई। बैठने के लिए कहा। गले लगते ही उनके आंखों में आंसू थे। निराश के भाव उभर रहे थे। मै अब उनके आंसू नहीं देखना चाहता था और न उनकी निराशापन पर चर्चा करना चाहता था। सो मैने प्रसंग बदल दिया और जगमोहन भाई भी समझ गए कि प्रेम इस विषय पर बात नहीं करना चाहता। मै इसलिए नहीं करना चाहता था कि अभी अभी तो जगमोहन भाई अस्पताल से आए ही है। मुझे लगा कि उनके सामने इस वक्त सकारात्मक चर्चा ही करनी जरूरी है।
जगमोहन भाईजी के साथ लंबी चर्चा हुई। उनके स्वास्थ्य से लेकर एवं आज के चिकित्सकों पर काफी बाते हम लोगों ने एक दूसरे के साथ साझा किए। यहां तक बात आई कि जिस समाज के लिए पत्रकार रोज लड़ता है वह समाज कभी उस पत्रकार को पहचानने की कोशिश भी नहीं करता। बस लड़ते रहो, खपते रहो यही अब एक मिशनरी पत्रकार की दिनचर्या हो गई है। स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखें, जैसे बातचीत के बाद हमने भाईजी जगमोहन रौतेला से विदा ली। इससे पहले बिटिया बुलबुल ने हम सभी की एक फोटो भी खींच दी। मैने बुलबुल को कहा बेटा एक सेल्फी को जिसमें आप भी हमारे साथ फोटो में हो।
हमे अब हल्द्वानी में कुछ और लोगों को मिलना था, पर दोपहर के तीन बज चुके थे। हमारी ट्रेन काठगोदाम से रात्री के 7:55 पर देहरादून के लिए रवाना होगी। इसलिए मेरे साथ आए मुकेश भाई ने कहा कि भाई साहब जब हल्द्वानी आए हैं तो उन्हें थोड़ा हल्द्वानी बाजार घूमना है। हमने मिलने वाले कार्यक्रम को रद्द किया और हल्द्वानी बाजार में घूमने निकल पड़े। उस दिन शुक्रवार था, शिक्षक दिवस भी था और छुट्टी का दिन भी था, इसलिए बाजार में कोई खास रौनक नहीं थी। हम लोग पांच बजे सायं तक बाजार में घूमते रहे। उसके बाद हम लोग ऑटो रिक्शा से काठगोदाम रेलवे स्टेशन पहुंच गए।
आदतन मै सीधे स्टेशन के वेटिंग रूम में प्रवेश कर गया। प्रवेश द्वार पर खड़ा कर्मचारी मेरी रेल की टिकट का विवरण मुझसे मांगते है और वेटिंग रूम में बैठने बाबत चार्ज की मांग करते है।
यहां मालूम हुआ कि रेलवे स्टेशन पर अब आप वेटिंग रूम में मुफ्त में नहीं बैठ सकते। काठगोदाम वाले स्टेशन पर वेटिंग रूम में बैठने का 10 रुपए प्रति घंटा प्रति व्यक्ति चार्ज देना पड़ता है। मैने वेटिंग रूम में चार्ज लेने वाले कर्मचारी से पूछा कि ऐसा क्यों है? तो उन्होंने बताया कि यह देशभर के अधिकांश रेलवे स्टेशनों पर आरंभ हो गया है। सो हम अब क्या कर सकते थे, हमने भी दो घंटे का चार्ज भुगतान कर दिया।
इसके अलावा यहां वेटिंग रूम के किराया वसूल करने का जिनका जिम्मा है यही लोग यात्रियों को पैकिंग भोजन की व्यवस्था भी करते है। मैने इस कर्मचारी से दो थाली रात्री भोजन हेतु पैक करवा दी। हमारी ट्रेन इस बार काठगोदाम से नियत समय पर देहरादून के लिए रवाना हुई। रात्रि के 10 बजे के लगभग हमने भोजन किया और सो गए। मेरी नींद अगले दिन यानी 6 सितंबर को प्रातः ठीक 4:30 बजे खुल गई थी। देखा तो मेरा साथी मुकेश और अन्य यात्री गहरी नींद में सो रखे थे। मैने ट्रेन की खिड़की से पर्दा हटाया तो उस वक्त हम हार्रावाला स्टेशन पहुंच चुके थे। हरिद्वार से देहरादून के बीच ट्रेन बिल्कुल धीमी स्पीड से चलती है। अंततः हम प्रातः 5 बजे देहरादून स्टेशन पर उतर गए।
मुझे वॉशरूम जाना था। मैने मुकेश भाई को कहा कि वेटिंग रूम चलते है। मुकेश भाई ने भी कहा कि ठीक है। फ्रेस होकर ही घर की तरफ चलते है। अब मुझे लगा कि यहां भी 10 रुपए प्रति व्यक्ति प्रति घंटा चार्ज होगा। वेटिंग रूम के काउंटर पर हमे उक्त कर्मचारी ने बताया कि यहां 30 रुपए प्रति व्यक्ति प्रति घंटा चार्ज है। ऑर्गोमेंट आदि करने की इस स्थिति में कोई गुंजाइश दिखाई नहीं दे रही थी। यहां भी हमने एक घंटे का चार्ज भरा और फिर अपने घर की तरफ रवाना हुए। इतने में मुकेश भाई को उत्तरकाशी के ब्रह्मखाल निवासी करण सिंह पंवार का फोन आया कि यदि तुम लोग हल्द्वानी से देहरादून पहुंच गए हैं तो प्रिंसचौक स्थित वह एक होटल में रुके हुए है। यहां आ जाओ चाय पीकर चले जाना। मैने मुकेश को कहा कि चाय तो पीनी है, क्यों न करण भाई के साथ चाय पी जाए।
हम दोनों लोग प्रिंस चौक स्थित करण भाई के पास पहुंच गए । जहां हमने चाय पी, कुछ उत्तरकाशी आपदा से संबंधित जानकारी पर बातचीत हुई। इसके बाद स्टेशन पर मेरा स्कूटर था उसे उठाकर अपने घर पहुंच गया।