ढोल-दमाऊं और लोकनृत्य के साथ आगे बढ़ी मां नंदा की जात, डोलियों ने पकड़ी रफ्तार

चमोली। “जय मां नंदा, जय बंड भूमियाल” के जयकारों, ढोल-दमाऊं की थाप और लोकनृत्य के साथ मां नंदा की बड़ी जात अपने चौथे दिन पूरे शबाब पर है। 5 सितंबर को कैलाश विदा के साथ शुरू हुई इस हिमालयी महाकुंभ यात्रा में इन दिनों पूरा चमोली नंदामय हो गया है।

बारिश और उफनते नदी-नालों को पार कर भी भक्तों का उत्साह कम नहीं है। मां जिस गांव से गुजर रही हैं, वहां फूल-मालाओं से स्वागत, रात में जागरण, झुमैलो नृत्य और मांगलिक कार्यक्रम हो रहे हैं। महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में नंदा के लोकगीत गाते हुए नाच रही हैं।

मंगलवार को “बंड की डोली” मेहर गांव के दीगोली से गडोरा, गडी, तल्ला अगथल्ला होते हुए पीपलकोटी बाजार पहुंची, जहां बाजार में श्रद्धालुओं ने नृत्य कर मां का स्वागत किया। यहां से डोली रात्रि विश्राम के लिए नौरख गई। वहीं कुरुड मां नंदा की डोली नंदानगर घाट से कांडई, खलतरा, मोठा, चाका होते हुए सेमा पहुंचेगी और “बधाण की डोली” सरपाणी, लांखी होते हुए भेटी में प्रवास करेगी। यात्रा में मंदिर कमेटी अध्यक्ष सुखबीर सिंह रौतेला, पश्वा मुंशी चंद्र गौड़, पुजारी दिनेश गौड़ सहित सैकड़ों श्रद्धालु नाचते-गाते चल रहे हैं।

यह यात्रा हिमालय का महाकुंभ है, जिसकी शुरुआत सातवीं सदी में राजा शालिपाल ने की थी। हर 12 साल में होने वाली यह 280 किमी की यात्रा अब तक 1843, 1863, 1886, 1905, 1925, 1951, 1968, 1987, 2000 और 2014 में हो चुकी है। इस बार कुरुड़ ने 2026 में बड़ी जात शुरू कर दी है, जबकि नौटी समि.ति मुख्य राजजात 2027 में कराएगी।

उधर प्रशासन ने सुरक्षा को लेकर एडवाइजरी जारी की है। वन विभाग, पुलिस और एसडीआरएफ की टीम ने वाण से ज्यूरागली 32 किमी और सुतोल से हेमकुंड 34 किमी तक कुल 66 किमी पैदल मार्ग का निरीक्षण किया, जिसमें कई हिस्से दुर्गम और भूस्खलन-संवेदनशील मिले हैं। जिला पर्यटन अधिकारी अरविंद गौड़ ने बेदनी से आगे यात्रा सीमित रखने और वाण में स्वास्थ्य परीक्षण अनिवार्य करने को कहा है।

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